हम किसी भी जाति के पुजारी नहीं हैं,

महर्षि अनमिषीने एक उपदेश पढ़ा – ‘कुबेर या गरीब, लेकिन जब तक वह परिश्रमसे प्राप्त किया धन का एक हिस्सा परोपकार में समर्पित नहीं करता है, तब तक वह अधर्म का खाता है …’!
महर्षि इस बोध से बहुत प्रभावित हुए और पत्नी सहित प्रतिज्ञा किया कि वह भोजन अर्पित करने के बाद ही खाएंगे। वह घर पर कोई भी दीन – दुःखी त्रासदी के आगमन की प्रतीक्षा करते । अगर कोई गरीब आता है तो प्रसन्न होकर भोजन खिलाते । अतिथि के आगमन का सत्कार करते ।
कई सालों तक, ऋषि और ऋषिपतिनी की इस योजना अच्छी तरह से चलता रहा, लेकिन कोई भी तप किंमत चुकाये बिना सिद्ध नहीं होता…! एक दिन भोजन का समय हो गया फिर भी कोई भूखा अतिथी नहीं आया । उन्होंने बहुत इंतज़ार किया । आखिरकार, ऋषि अनमिषी अपने कुटिर से बाहर निकले । थोड़े दूर जाने पर कुष्ठ रोग से पीड़ित एक बुजुर्ग वृद्ध को दुःख और भूख से पीड़ित देखा देखा।
ऋषि उसके पास गए और कहा, ‘प्रिय भाई, चलो मेरे घर । भोजन तैयार हैं। यदि आप भोजन करते हैं, तो आपका दर्द भी थोड़ा कम होगा … ‘
वृद्धने कहा, “आर्य, मैं आपका उदारता का अधिकारी नहीं हूं। मैं निचली जाति के कारण आपके वहां खाने में सक्षम नहीं हूं। यदि संभव हो, तो घर से बाहर कुछ रोटीयों का टुकड़ा फेंक दें। उसको में जमीन पर से लेकर मेरा पेट भर लूँगा…”
बुढ़ापे की बात को सुनने पर, आंखों में करुणा जागृत हो गई है। उसने कहा, ‘तुम ऐसा नहीं कहो । हम किसी भी जाति के पुजारी नहीं हैं, लेकिन हम आत्मा के उपासक हैं…! मेरे साथ चलो…”‘
ऋषि अनमिषीने उन्हें उनके साथ ले गए । पति और उसकी पत्नीने अति प्रेम भोजन कराया और फिर भोजन किया। कहानी कहती है कि उस रात, अग्निदेव ऋषि अंमिशी के सामने उपस्थित हुए और कहा,
‘आप भगवान के सच्चे उपासक हैं। जो उच्च – बदसूरत, हाथी या कुत्ते के बीच कोई भेद नहीं करता है। सिर्फ केवल वे लोग जो उनकी आत्मा की खुशी के बारे में सोचता है । ‘
ऋषि अनमिषी की विचारधारा को ध्यान में रखते हुए, हरि ૐ संदेश – सूरत आज दिनांक 25-7-18 को, सूरत में अश्विनी कुमार समसान में अग्निदाह और सफाई के निर्बाध दिन – रात काम करने वाले दासों को वितरित किया गया…!

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